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Kamukta Mastram Ki Savita

Desikahani Kahani

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Kamukta | Mastram Ki Savita विनोद की पत्नी सविता बेहद खूबसूरत व हंसमुख स्वभाव की थी। जबकि विनोद साधारण कद-काठी और सांवले रंग का था। उसकी जुबान भी कड़वी थी।

शादी के पूर्व विनोद को जरा भी अनुमान नहीं था, कि उसे सविता जैसी बेहद खूबसूरत पत्नी मिलेगी। विनोद तो अपने भाग्य पर इतरा रहा था, लेकिन सविता अपने अनुरूप पति न पाकर मन ही मन दुखी रहती थी। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, इसलिये जिंदगी खुशहाल कटने लगी। Kamukta | Mastram Ki Savita

धीरे-धीरे तीन वर्ष बीत गये, किन्तु सविता की गोद नहीं भरी। इस कारण वह तनाव ग्रस्त रहने लगी। सविता को शक हुआ, कि विनोद में कुछ कमी है, जिसके कारण वह मां नहीं बन सकी। उसने विनोद से इलाज कराने को कहा, तो उसने सविता को डपट दिया। बस यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ गया। यद्यपि इस बीच सविता ने कई तांत्रिकों की शरण ली, तो उन्होंने भी पति में ही कमी बताई।

कहते हैं कि औरत का शक पत्थर की लकीर होता है। सविता को भी शक होने लगा था, कि उसका पति नपुंसक है, जिससे वह कभी मातृत्व सुख प्राप्त नहीं कर पायेगी। इस कारण घर में कलह होने लगी। कलह बढ़ी, तो विनोद ने शराब पीना शुरू कर दिया।

अब वह दुकान बंद कर पहले शराब के ठेके पर जाता, फिर लड़खड़ातेे कदमों से घर पहंुचता। कभी खाना खाता, कभी बिना खाये ही चारपाई पर लुढ़क जाता। सविता भी नफरत से भरी रहती थी, तो पति की परवाह ही न करती थी। वह तो उसे ठूंठ समझने लगी थी।

इन्हीं दिनों विनोद ने चक्की चलाने के लिये एक नया नौकर रख लिया। उसका नाम मस्तराम गुप्ता था। मस्तराम जगनपुरा में रहता था। उसके पिता रतन गुप्ता साधारण किसान थे।

मस्तराम हाईस्कूल तक पढ़ सका था। उसके बाद रसूलाबाद में चक्की पर काम करने लगा था। वहीं उसने चक्की चलाना सीखा। कुछ साल काम करने के बाद उसने वहां काम छोड दिया और पिता के साथ खेती करने लगा था।

एक रोज उसे मालूम हुआ, कि सहायल कस्बा निवासी विनोद को चक्की चलाने के लिये मिस्त्राी की जरूरत है, तो वह विनोद से मिला। बातचीत व वेतन तय करने के बाद विनोद ने मस्तराम को नौकरी पर रख लिया।


Kamukta | Mastram Ki Savita मस्तराम गुप्ता मेहनती था। पिसाई भी अच्छी करता था, अतः साल बीतते वह विनोद का चहेता बन गया। मस्तराम की वजह से उसकी आटा बिक्री भी बढ़ गयी थी। अतः दुकान का सारा भार उसने मस्तराम को ही सौंप दिया था। मस्तराम दिन भर की बिक्री का हिसाब-किताब विनोद को सौंप देता, फिर दुकान बन्द कर अपने घर चला जाता। कस्बा और जगनपुरा के बीच एक किलोमीटर का फासला था।

एक रोज मस्तराम गुप्ता दुकान पर पहंुचा, तो दुकान बन्द थी, जबकि बाजार का दिन था और कई ग्राहक सामान लेने खड़े थे। सोच-विचार में डूबा मस्तराम अपने मालिक विनोद के घर पहंुचा। उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो विनोद ने दरवाजा खोला।


मस्तराम को देखकर वह बोला, ‘‘आज मेरी तबियत खराब है। तुम जाकर दुकान ‘‘खोल लो। तबियत हल्की हुयी, तो दोपहर बाद तक आ जाऊंगा।’’

‘‘ठीक है भइया, आप आराम करें।’’ कहकर मस्तराम चाबी लेकर चलने लगा।

तभी विनोद पुनः बोला, ‘‘अरे मस्तराम आये हो, तो चाय नाश्ता कर लो। अभी मैंने भी चाय नहीं पी है।’’ फिर उसने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘अरे सविता, जरा दो कप चाय और साथ में कुछ नमकीन ले आओ।

सविता मन ही मन बुदबुदाई। फिर कुछ देर बाद चाय और नमकीन लेकर आई। सविता जब झुकर टेª मेज पर रखने लगी, तो मस्तराम उसे ठगा-सा देखता रह गया। वह कभी विनोद को देखता, तो कभी सविता को, जिसके दिलकश चेहरे में गजब का आकर्षण था। वह विनोद से उम्र में भी कम लग रही थी। लगता था जैसे 20.22 साल की शोख हसीना हो। जबकि विनोद उसके सामने कहीं भी नहीं ठहरता था। वह पहली ही नजर में सविता का दीवाना बन गया।

जो हाल मस्तराम का था, वही सविता का। उसने भी हृष्ट-पुष्ट नौजवान मस्तराम को देखा, तो सोचने लगी, कि काश! ऐसा ही मर्द उसकी जिंदगी में होता, तो जीवन खुशहाल बन जाता। ललचायी नजरों से देखती हुयी सविता बैठ गयी और पति से बोली, ‘‘वह कौन है? पहली बार देख रही हूं। कोई खास मेहमान है? कहो तो खाना-वाना बना देती हूं।’’

Kamukta | Mastram Ki Savita ‘‘अरे नहीं…. नहीं।’’ मुस्करा कर बताया विनोद ने, ‘‘यह मस्तराम है। बड़ा मेहनती है। दुकान पर काम करता है। जब से वह आया है। दुकान अच्छी चलने लगी है। आटा की सप्लाई भी बढ़ गयी है। आज दुकान नहीं पहंुच पाया, तो चाबी लेने घर आ गया।’’

मस्तराम, सविता का दीवाना बन गया था, अतः किसी न किसी बहाने वह सविता के पास पहंुच जाता और उसके रूप सौन्दर्य की तारीफ करता। मस्तराम भूल गया, कि उसका रिश्ता नौकर मालकिन का है। सविता भी मस्तराम की तरफ आकर्षित थी। अतः दोनों में हंसी-मजाक होने लगा। कभी कभी यह हंसी-मजाक सामाजिक मर्यादाओं को भी लांघ जाता था, लेकिन सविता बुरा नहीं मानती थी।


सविता की बात सुनकर विनोद का हाथ जहां का तहां रुक गया। फिर कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘यदि ऐसी बात थी, तो तूने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’’

‘‘कैसे बताती, तुम्हारा धंधा बन्द नहीं हो जाता। तुम्हें याद नहीं, पिछली बार जब तुमने उसे निकाल दिया था, तब धंधा मंदा पड़ गया था। तभी तो तुमने दोबारा उसे नौकरी पर रखा था।’’

‘‘अरे धंधा जाये भाड़ में। एक बार उस दो टके के नौकर मस्तराम को माफ कर दिया था, तो क्या बार-बार थोडे़ ही माफ कर दूंगा।’’ वह आंखों से अंगारे बरसाता हुआ बोला, ‘‘अब तो मैं उसे सबक सिखा कर ही रहूंगा, लेकिन…?’’

‘‘लेकिन क्या?’’ सविता ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या सोचा है तुमने?’’

‘‘मैंने जो भी सोचा है, उसमें तुम्हें मेरा साथ देना होगा।’’ विनोद ने सख्त भाव से पूछा, ‘‘दोगी न मेरा साथ?’’

‘‘म… मु… मझे क्या करना होगा?’’ सविता ने थूक निगलते हुए पूछा।

‘‘उसे घर बुलाना होगा। फिर हम दोनों मिलकर उसको सदा के लिए शांत कर देंगे।’’ गंभीर होकर बोला विनोद।

‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती। यह तो पाप है।’’ सविता घबरा कर बोली।

‘‘जब तुम उस कमीने के साथ रंगरेलिया मनाती थी, तब पाप नहीं था और अब पाप-पुण्य समझा रही है।’’

कुछ देर ना नुकुर के बाद सविता, पति का साथ देने को तैयार हो गयी। उसके बाप विनोद व सविता ने मस्तराम की हत्या की योजना बनायी।

इस योजना की जानकारी सविता ने मस्तराम को नहीं दी और पहले जैसा प्यार दर्शाती रही। मस्तराम को जरा भी आभास नहीं हुआ, कि उसकी मौत का ताना-बाना बुना जा चुका है।

योजना के तहत एक शाम मस्तराम ने दुकान बन्द की और चाभी विनोद को देकर घर के लिये रवाना हुआ। अभी उसने कस्बा पार ही किया था, कि मोबाईल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नजर डाली, तो नम्बर सविता का था। उसने मोबाईल रिसीविंग वाला बटन दबाया और बोला, ‘‘हां भाभी कहिए, सब ठीक तो है?’’


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‘‘तुम्हारे बिना सब ठीक कैसे हो सकता है?’’ मादक स्वर में बोली सविता, ‘‘तुम्हारी याद सता रही है। जल्दी अपनी सविता के पास चले आओ।’’

‘‘ठीक है भाभी, मैं चन्द मिनटों में आता हूं।’’ मन ही मन सविता के गुदाज बदन को पाने की खुशी में चहक रहा था मस्तराम, ‘‘हाय! क्या मजा आयेगा, जब सविता भाभी के वस्त्रा उतार कर उसकी देह में समाऊंगा।’’

कुछ देर बाद ही मस्तराम सविता के घर आ गया। आते ही उसने सविता को बाहों मंे भरा तो सविता छिटक कर दूर हो गयी और बोली, ‘‘मस्तराम, अब तक तुम जबर्दस्ती करते रहे लेकिन अब नहीं कर पाओगे। मुझे हाथ लगाया तो पछताओगे।’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो भाभी!’’ हैरत से बोला मस्तराम, ‘‘मंैने कभी जबर्दस्ती नहीं की, जो मिलन हुआ तुम्हारी मर्जी से हुआ।’’

Kamukta | Mastram Ki Savita कहते हुए मस्तराम ने ज्यांे ही सविता को दोबारा बाहों में भरा त्यों ही सामने विनोद आ गया। मस्तराम को देखकर विनोद उस पर टूट पड़ा और डंडे से उसकी पिटाई करने लगा। मस्तराम दरवाजे की ओर भागा तो सविता सामने आ गयी। उसने कमरे की कंुडी अन्दर से बन्द कर ली।

मस्तराम पिटते हुए जमीन पर गिर पड़ा। मस्तराम हाथ पैर चलाने लगा तो सविता ने उसके पैरों को दबोच लिया और विनोद ने गला कस दिया। फिर कुछ देर बाद ही मस्तराम की सांसे थम गयी। हत्या करने के बाद विनोद ने शव को बोरी में भरा और साइकिल से रखकर कस्बा के बाहर तालाब किनारे फेंक आया।

इधर जब देर रात तक मस्तराम घर नहीं पहुंचा, तो उसके पिता रतन गुप्ता को चिंता हुयी। उसने फोन मिलाया, तो मस्तराम व उसके मालिक विनोद का स्विच आॅफ था। सुबह वह सहायल कस्बा को रवाना हुए, तो कस्बा के बाहर तालाब पर भीड़ जुटी थी। वह वहां पहुंचे, तो मस्तराम के शव की शिनाख्त की और पुलिस में सूचना दी।

सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहंुंची और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की। जांच में अवैध रिश्तो में हुयी हत्या का पर्दा फाश हुआ।

कहानी लेखक की कल्पना पर आधारित है व इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल संयोग मात्र हो सकता है।