
प्रयागराज (जिसे पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था) की पावन भूमि केवल त्रिवेणी संगम, पवित्र कुंभ और अपनी पौराणिक महत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहाँ का दशहरा महोत्सव किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के हर कोने, हर मोहल्ले और हर क्षेत्र में भव्य मेलों का एक अनूठा सिलसिला चलता है। लाइट की जगमगाती सजावट, भव्य और कलात्मक चौकियाँ, और हर गली में गूँजती रामधुन इस पर्व को दुनिया भर में खास बनाती है। वर्ष 2026 में यह उत्सव नए उत्साह, आधुनिक चमक-दमक और पारंपरिक निष्ठा के साथ मनाया जा रहा है। इस लेख में हम प्रयागराज के इस ऐतिहासिक पर्व, इसके पूरे शेड्यूल और इससे जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को विस्तार से जानेंगे।

साल 2026 में प्रयागराज दशहरा मेला के खास कार्यक्रम और तिथियाँ
प्रयागराज में शारदीय नवरात्रि के आरंभ से लेकर विजयादशमी और उसके बाद कई दिनों तक मेलों और रामलीलाओं की धूम रहती है। वर्ष 2026 का विस्तृत और अनुक्रमित शेड्यूल इस प्रकार है:
6 अक्टूबर 2026: मुकुट पूजन एवं रावण की सवारी/बारात की शुरुआत
11 अक्टूबर 2026: रामलीला का मंचन प्रारंभ
13–19 अक्टूबर 2026: ऐतिहासिक श्रृंगार चौकियां (भोर की चौकी, मोती की चौकी, शेषनाग चौकी आदि)
14 अक्टूबर 2026: नया पुरवा करेली का मेला
15 अक्टूबर 2026: अल्लापुर मेला
16 अक्टूबर 2026: सिविल लाइन्स मेला
17 अक्टूबर 2026: दारागंज मेला
18 अक्टूबर 2026: कटरा मेला
19 अक्टूबर 2026: चौक, मुट्ठीगंज मेला एवं नवमी का रामदल
20 अक्टूबर 2026: विजय दशमी / रावण दहन (विजयादशमी - विजय मुहूर्त दोपहर 1:42 बजे से 2:27 बजे तक)
21 अक्टूबर 2026: नैनी, सोरांव, फूलपुर मेला एवं भरत मिलाप
22 अक्टूबर 2026: डांडी, महेवा मेला
23 अक्टूबर 2026: राजरूपपुर मेला
24 अक्टूबर 2026: फाफामऊ मेला
25 अक्टूबर 2026: राजगद्दी के साथ उत्सव का समापन
श्री पजावा एवं श्री पत्थरचट्टी रामलीला कमेटी: विद्युत चौकियों का जादुई दृश्य
प्रयागराज की रामलीला में श्री पजावा रामलीला कमेटी और श्री पत्थरचट्टी रामलीला कमेटी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहाँ की विद्युत (लाइट) चौकियाँ अपनी बेहतरीन कलात्मकता और भव्यता के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। शहर के मुख्य कारोबारी और ऐतिहासिक क्षेत्र 'चौक' का मेला देखने लायक होता है।
आमने-सामने का अलौकिक दृश्य: नवमी और दशमी के खास दिन नकास कोहना एवं बतासा मंडी से अपनी-अपनी भव्य विद्युत चौकियाँ लेकर जब ये कमेटियां चौक क्षेत्र (कोतवाली और बरांडे के बीच) पहुँचती हैं, तो दोनों तरफ से निकलने वाली चौकियों का आमने-सामने का दृश्य अत्यंत भव्य, रोमांचक और अलौकिक होता है।
कलात्मक जड़ाऊ चौकियाँ: आधी रात के बाद निकलने वाली इन आकर्षक जड़ाऊ चौकियों की सजावट और लाइटिंग देखते ही बनती है।
दिव्य स्वरूपों के दर्शन: ट्रैक्टर या बड़े वाहनों पर सजाई जाने वाली इन झांकियों में पहले भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के बाल स्वरूप विराजित होते हैं। कुछ ही पलों के बाद माता सीता के साथ संपूर्ण राम दरबार के दर्शन पाकर भक्त निहाल हो जाते हैं।
ऐतिहासिक परंपरा, 'ताड़का वध' और दधिकांदो का महत्व
प्रयागराज के विभिन्न क्षेत्रों जैसे सुलेमसराय, चांदपुर सलोरी, रसूलाबाद, तेलियरगंज, राजापुर, कीडगंज और बैरहना में आयोजित होने वाला दधिकांदो और रामदल सनातन संस्कृति को जीवंत कर देता है। इन चौकियों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
ताड़का वध प्रसंग: विजयादशमी के आसपास रामलीला मंचन में ताड़का वध, सुबाहु वध और ताड़कासुर प्रसंग का सजीव मंचन दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। बाल स्वरूपों की अद्भुत एक्टिंग और संवाद अदायगी में पारंपरिक शैली की मिसाल दिखती है।
युवा पीढ़ी की भागीदारी: आज हर मोहल्ले में युवा पीढ़ी बढ़-चढ़कर इस प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ा रही है, जिससे नई पीढ़ी अध्यात्म और धर्म के साथ गहराई से जुड़ती है।
प्रयाग के मेले का सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व
प्रयागराज का यह दशहरा मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का एक बहुत बड़ा माध्यम है।
शिल्प और कला का प्रदर्शन: यहाँ के स्थानीय कारीगरों द्वारा महीनों की मेहनत से तैयार की जाने वाली लाइट वाली चौकियाँ भारतीय हस्तशिल्प और इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना होती हैं।
सामाजिक समरसता: यह पर्व जाति, वर्ग, अमीर-गरीब और उम्र की तमाम सीमाओं को लांघकर पूरे शहर को 'राममय' बना देता है। सभी लोग मिलकर इस उत्सव का आनंद लेते हैं।
नैतिक शिक्षा: रावण दहन और रामलीला के प्रसंग हमें बुराई पर अच्छाई की जीत और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
प्रयागराज मेले का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के बारे में एक जानकारी
पौराणिक उत्पत्ति और वेदों में जानाकरी मिलती है। सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने यहाँ 'प्रयाग' में पहला यज्ञ किया था। जिसके कारण इसे 'तीर्थराज' कहा जाता है। इसका मतलब तीर्थों का राजा होता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यह मिलन स्थल वेदों और पुराणों में मोक्ष का द्वार माना गया है। यहाँ स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलने की धार्मिक मान्यता है। आपको बता दे कि प्रयागराज महर्षि भारद्वाज, महर्षि दुर्वासा और ऋषि याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषियों की तपोभूमि रहा है। महर्षि भारद्वाज का आश्रम यहीं स्थित था। इस आश्रम में हज़ारों विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।
सम्राट हर्षवर्धन और दान की परंपरा: इतिहास के पन्नों को पलटें तो प्राचीन काल में सम्राट हर्षवर्धन हर पाँचवें वर्ष प्रयाग में 'महामोक्ष परिषद' (कुंभ मेले का प्राचीन रूप) का आयोजन करते थे। वे अपना पूरा धन दौलत और राजपाट दान कर देते थे, जिसके बाद वे साधारण कपड़े पहनकर लौटते थे। यह ऐतिहासिक प्प्ररमाण यागराज के मेलों की विशालता और उनके दान-धर्म के महत्व को बताता है।
आधुनिक समय में स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक एकता में योगदान भी यहां का योगदान रहा है। आधुनिक इतिहास में प्रयागराज (इलाहाबाद) स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केंद्र रहा है। आनंद भवन और स्वराज भवन से देश की आजादी की रूपरेखा तैयार हुई। यहाँ लगने वाले मेले और रामलीलाएँ (जैसे ऐतिहासिक दशहरा और दधिकांदो) केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि इन्होंने अलग अलग जातियों, वर्गों और समुदायों के लोगों को आपस में जोड़कर एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना तैयार किया है।
आप भी यहां इस दशहरे धूमने का प्लान बना सकते हैं और संगम स्नाना के साथ ही यहां के मशहूर मेले का आनंद ले सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. प्रयागराज में वर्ष 2026 का रावण दहन कब है?
उत्तर: वर्ष 2026 में मुख्य विजयादशमी और रावण दहन 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार) को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार विजय मुहूर्त दोपहर 1:42 बजे से 2:27 बजे तक रहेगा।
Q2. प्रयागराज की विद्युत चौकियाँ क्यों प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: श्री पजावा और श्री पत्थरचट्टी रामलीला कमेटियों द्वारा आधी रात के बाद निकाली जाने वाली जड़ाऊ और लाइट से सजाई गयी चौकियाँ अपनी अद्भुत कारीगरी, विशालता और राम दरबार के सजीव स्वरूपों के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं।
Q3. प्रयागराज में प्रसिद्ध 'दधिकांदो' और मेले कहाँ-कहाँ आयोजित होते हैं?
उत्तर: यह उत्सव चौक, मुट्ठीगंज, दारागंज, सिविल लाइन्स, सुलेमसराय, चांदपुर सलोरी, तेलियरगंज, राजापुर, कीडगंज, बैरहना और नैनी सहित शहर के लगभग हर मोहल्ले में भव्य रूप से आयोजित किया जाता है।
Q4. प्रयागराज का दशहरा मेला कब से शुरू होता है?
उत्तर: यहाँ मेलों की शुरुआत शारदीय नवरात्रि के आरंभ (मुकुट पूजन व रावण की सवारी) से हो जाती है और विजयादशमी के बाद भरत मिलाप तथा राजगद्दी (25 अक्टूबर 2026) तक इसका सिलसिला चलता है।
वर्ष 2026 का यह दशहरा प्रयागराज की सांस्कृतिक गरिमा को एक नई ऊँचाई दे रहा है, जहाँ हर कोई इस पावन और ऐतिहासिक पर्व का हिस्सा बनने के लिए पूरी तरह उत्सुक रहता है।






