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कबीर के दोहे विथ मीनिंग इन हिंदी। संत कबीर दस महाराज।

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kabir ke dohe in hindi 


"कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई,

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।।"

अर्थ- कबीर कहते हैं की समुद्र की लहरों के साथ-साथ मोती भी आकर बिखर आई हैं। लेकिन बगुला उनका राज या भेद नहीं जानता इसीलिए उसे भूखा रह जाना पड़ जाता हैं वही हंस भेद या राज या गुण जानता हैं तो

"जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाइ,

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।।"

अर्थ- कबीर इस दोहे के माध्यम से एक बहुत बड़े कटु सत्य उजागर करने का सफल प्रयास करते हैं। वो कहते हैं की -" आपके पास भले ही बहुत गुण हो बहुत सदगुण हो लेकिन आपका मोल तभी लगेगा आपकी वैल्यू तभी लाखो में जाएगी जब आपके गुण पहचानने वाला जौहरी या ग्राहक मिलेगा

अन्यथा अनमोल होते हुवे भी गुण की कीमत कौड़ी के बराबर हो जाएगी यदि गुण को पहचानने वाले नहीं मिलते या उसकी कीमत साझ कर उसके ग्राहक नहीं मिलते।

"जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।"

अर्थ- बहुत ही सुन्दर और सार्थक सन्देश देते हुवे इस Sant Kabir Das Ke Dohe में कहा गया हैं की - "किसी ज्ञानी व्यक्ति का या सज्जन व्यक्ति की जाती मत पूछिए, पूछना ही हैं तो वो कितना ज्ञानी हैं कितना जानकारी रखता हैं उसका ज्ञान पूछिए। मोल करना हैं तो तलवार की करो उसके म्यान को पड़ा रहने तलवार कीमती हैं उसका म्यान नहीं। उसी प्रकार सज्जन या साधू व्यक्ति का ज्ञान की कीमत हैं उसके जात की नहीं।

"दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।।"

अर्थ- कबीर दास जी इस दोहे में उन पर एक बहुत कड़ा प्रहार करते हुवे की-" यह इंसान का आम स्वभाव हैं की वो दुसरो की गोष और गलतियों को देखकर उसकी बरबादी पर मंद मंद मुस्कुराते हुवे खुश होते हुवे चलता हैं. लेकिन उसे अपने दोष की याद नहीं आती की वो इतना ज्यादा हैं की जिसका ना ही शुरुआत हैं।

ख़त्म हैं अर्थात गलतियों का इतना भंडारा होते हुवे भी जिसका न अंत हैं फिर भी मनुष्य दुसरो गलतियों को देख अनुभव करता हैं यह उसका अहंकार और मूरखता ही हैं".