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10 सितंबरः गणपति उत्सव

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गणपति उत्सव का आरंभ

सन 1881 में लोकमान्य तिलक पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। मराठा एवं केसरी नामक समाचार पत्रों के माध्यम से वह जनता के निकट संपर्क में आ गए थे। अब उन्होंने समाज -  सुधार के क्षेत्र में पदार्पण किया।

शास्त्रों के आधार पर सन 1890-91 में उन्होंने अस्पृश्यता - निवारण बिल तथा विधवा - विवाह का विरोध किया। उन्होंने यह बात डंके की चोट पर कहीं के कानून द्वारा धार्मिक सुधार करना सर्वथा अनुचित है। उनके लेखों और व्याख्यानों ने जनता पर गहरा प्रभाव डाला। जनता तिलक को भारतीय संस्कृति और सभ्यता का रक्षक समझने लगी।

श्री तिलक ने अब यह बात भली प्रकार समझ ली कि उससे और मेले जनजागृति के अत्यंत सहज और सफल माध्यम है, तब उन्होंने मराठी में प्रकाशित अपने समाचार पत्र केसरी द्वारा तथा व्याख्यान द्वारा और साथ ही जनसंपर्क द्वारा गणपति उत्सव तथा शिवाजी जन्मोत्सव की नींव डाली और सन 1893 में इसका शुभारंभ किया।

10 सितंबरः गणपति उत्सव

गणपति उत्सव का वर्णनः

भादों मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन प्रत्येक व्यक्ति गणपति की प्रतिमा को लाता है। अपने सामर्थ्य एवं इच्छा के अनुसार मूर्ति या प्रतिमा का आकार तय कर लिया जाता है। कुछ संस्थाएं भी अपने स्तर पर सामूहिक रूप से उत्सव मनाती है और वह भी गणपति की प्रतिमा लाती हैं।

इस उत्सव के अवसर पर पुराणों के आख्यानों को सुनाकर उनका विवेचन किया जाता है। इस प्रकार धर्म के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक दोनों पक्षों से जनता को परिचित कराया जाता है। जनता वैज्ञानिक दृष्टि जानने के बाद स्वयं ही व्यर्थ की रुढ़ियों का त्याग कर देती है। इस प्रकार गणपति उत्सव के माध्यम से लोगों को अपना सुधार स्वयं करने का मार्ग दिखाया जाता है। साथ ही जनता में अपनी स्थिति के प्रति असंतोष की भावना कम होती है।

गणपति जी की आरतीः

गणपति की प्रतिमा को पूरे आदर के साथ किसी वाहन में रखकर लाते हैं। उसके साथ लोग, स्त्री-पुरुष गाजे - बजाते चलते हैं। इस प्रकार गाजे-बाजे के साथ गणपति को लाकर अपने निवास - स्थान अथवा कार्यालय में किसी स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर पूरे सम्मान के साथ स्थापित कर दिया जाता है।

अपने सामर्थ्य के अनुसार फूल माला आदि द्वारा उनका श्रृंगार किया जाता है, आरती की जाती है, भजन – गायन, नृत्य आदि का कार्यक्रम आरंभ हो जाता है। गणपति जी की आरती करके उनको भोग लगाया जाता है, भोग में क्या लगाया जाए इसका बंधन नहीं है। गणपति को लड्डू बहुत पसंद है, इस कारण लड्डू ना कह कर संस्कृत नाम मोदक कहते हैं। मोदक का प्रसाद प्राप्त करके लोग रात्रि - जागरण भी करते हैं। पूर्णिमा के दिन गणपति जी को पूरे श्रृंगार एवं आदर के साथ वाहन में स्थापित कर के सबसे निकट के जलाशय पर ले जाते हैं।

रास्ते में इसी प्रकार उत्साह पूर्वक गाते बजाते जाते हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार गणपति को लाते समय करते हैं। तालाब के बीच में ले जाकर गणपति की प्रतिमा को तीन बार पानी में डूबोते होते हैं, और फिर जल समाधि प्रदान कर देते हैं। यहां यह बता देना आवश्यक है कि महाराष्ट्र निवासी अपने भजनों में गणपति जी का स्मरण पिता रूप में बप्पा कहकर करते हैं।